गुरु पूर्णिमा विशेष – वो 5 गुरु जिनके शिष्यों ने इतिहास की दिशा तय की

Guru Purnima
Guru Purnima

By – Poem Bhardwaj

गुरु’ दो शब्दों से बना है। ‘गु’ का अर्थ है- अंधकार या अज्ञान और ‘रु’ का अर्थ है- निरोधक, यानी जो ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान को ज्ञान से मिटा दे वह गुरु है।

गुरु चाहे तो अपने शिष्य को सफलता के शिखर पर बिठा दे, एक साधारण इंसान को महान बना दे ! आज गुरु पूर्णिमा के मौके पर हम आपको बताने जा रहे है ऐसे गुरु और शिष्यों की जोड़ी से जिन्हें इतिहास हमेशा याद रखेगा!

द्रोणाचार्य और एकलव्य – गुरु और शिष्य की जोड़ी ज़िक्र हो और द्रोणाचार्य और एकलव्य को हम ना याद करे तो कुछ अधूरा सा रह जाएगा ! लेकिन एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य से किस तरह शिक्षा प्राप्त की ये जानकर आपको हैरानी होगी, कहा जाता है की गुरु द्रोणाचार्य ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग को ही शिक्षा देते थे और एकलव्य एक निषाद पुत्र थे लेकिन गुरु द्रोणाचार्य ने एकलव्य को इस तरह प्रेरित किया की एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की प्रतिमा बनाई और गुरु का ध्यान करते हुए उसके सामने धनुर्विद्या का अभ्यास किया ! इस तरह धनुर्विद्या का अभ्यास करते हुए एकलव्य धनुर्विद्या में इतना निपुण हो गया बड़े- बड़े धुरंधर भी उसके सामने टिक नहीं पाते ! लेकिन गुरु द्रोणाचार्य को इस बात की ख़बर नहीं थी ! एक दिन गुरु द्रोणाचार्य अपने शिष्यों के साथ शिकार पर गए तो उन्हें एकलव्य की इस निष्ठा के बारे में पता लगा तो वो बहुत अचंभित हुए ! गुरु के प्रति अपनी निष्ठा का प्रमाण देते हुए एकलव्य ने गुरु दक्षिणा के रूप में अपना अंगूठा गुरु द्रोणाचार्य को दिया !

गुरु संदीपनी और कृष्ण जी – गुरु की आवश्यकता सिर्फ़ मनुष्य को नहीं बल्कि स्वयं भगवान को भी पड़ती है गुरु संदीपनी और कृष्ण इसका उचित उदाहरण है! संदीपनी कृष्ण और बलराम दोनों के गुरु थे संदीपनी ने कृष्ण को 64 कलाओं का ज्ञान दिया, 64 भिन्न कलाए कृष्ण 64 दिन में सीखी ! शिक्षा पूरी होने पर जब संदीपनी ने गुरु दीक्षा के रूप में यमलोक से अपने पुत्र को वापस धरती पर माँगा , कृष्ण ने संदीपनी को उनके पुत्र को वापस धरती पर लाकर अपनी गुरु दीक्षा अपने गुरु को दी!

चाणक्य और चंद्रगुप्त – मगध के राजा महानंद से अपमानित होने के बाद चाणक्य ने ये प्रतिज्ञा ली की जब तक वो महानंद से अपने अपना का बदला नी लेगा तब तक वो अपनी शिखा नहीं बांधेगा ! चाणक्य को एक ऐसे शिष्य कि तलाश थी जिसे शिक्षा देकर वह महानंद से अपना बदला ले सके ! चंद्रगुप्त के रूप में चाणक्य को एक होनहार शिष्य मिला, जिसे युद्ध कला में पारंगत कर उन्होंने अपने अपमान बदला लिया! चाणक्य-चंद्रगुप्त ने एक अखंड भारत की स्थापना की!

कर्ण और परशुराम – महाभारत का अध्ययन करने से पता चलता है की कर्ण परशुराम के शिष्य थे ! जब कर्ण परशुराम से शिक्षा लेने पहुँचे तो कर्ण ने ख़ुद को सूतपुत्र बताते हुए उनसे शिक्षा प्राप्त की ,कहा जाता है की एक बार की बात है जब परशुराम थक कर कर्ण की गोद में सर रख सो हुए तभी कर्ण को एक एक कीड़े ने काट लिया लेकिन गुरु की नींद में कोई विघ्न न आ जाए इसलिए कर्ण ने उफ़्फ़ नहीं कि और दर्द की पीड़ा को सेहता रहा !
जब परशुराम की नींद खुली और उन्होंने कर्ण को लहुलुहान देखा तो उन्होंने बहुत क्रोध आया क्योंकि वो समझ गए थे की ये कोई मामूली सूतपुत्र नहीं बल्कि एक क्षत्रिय है उन्होंने क्रोधित होकर कर्ण को श्राप दिया की जब मेरी सिखायी विद्या की तुम्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी तुम उस वक़्त मेरे द्वारा सिखायी सभी शस्त्र विद्या भूल जाओगे ! परशुराम के श्राप के कारण ही आगे चल कर कर्ण की मृत्यु हुई थी।

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद – रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद की मुलाक़ात एक मित्र घर हुई वही से दोनों की मुलाक़ातों का सिलसिला शुरू हुआ ! जब किसी कारणवश विवेकानन्द रामकृष्ण परमहंस से मिलने नहीं आ पाते थे तो रामकृष्ण परमहंस बेचैन हो जाते थे एक बार स्वामी विवेकानंद कई दिन तक उनसे मिलने नहीं आए रामकृष्ण परमहंस को ख़बर मिली की विवेकानंद का चरित्र बिगड़ गया है, तो रामकृष्ण परमहंस ने अपने भक्तों को भेजा जाओ पता लगाओ की हुआ क्या है फिर जब उनके भक्तों ने उन्हें आकर कहा कि विवेकानंद का चरित्र बिगड़ गया है और वो बुरी संगत में पड़ गया है लेकिन जब रामकृष्ण परमहंस ने ये सुना तो उन्हें ये सब मानने से साफ़ मना कर दिया और सभी पर बहुत नाराज़ हुए! ऐसा ही विश्वास विवेकानंद का भी था अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस पर था

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