पितृपक्ष में भूलकर भी न करें ये काम, हो जाएँ सावधान!

पितृपक्ष

हिंदू पुराणों और शास्त्रों में पितरों और पूर्वजों को देवताओं के समान माना गया है, इसीलिए पितृपक्ष में पितरों के नाम पर दान किया जाता है, तर्पण दिया जाता है और उनका श्राद्ध किया जाता है। जिससे हमारा जीवन सुखमय और आपके वंश की वृद्धि होती रहे। वैसे तो हर महीने की अमावस्या को शायद या पितरों के नाम पर दान किया जा सकता है, लेकिन शास्त्रों के अनुसार भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर अश्विनी मास की अमावस्या तक विधि-विधान पूर्वक श्राद्ध कर्म करने का विधान है।

इन 15 दिनों में पितरों को प्रसन्न किया जाता है ताकि हमें उनका आशीर्वाद प्राप्त हो और हम जीवन में उन्नति करें। लेकिन कई बार जाने अनजाने में हमसे कुछ गलतियां हो जाती है, जिनसे हमारे पितृ देव नाराज हो जाते हैं। इसीलिए पितृ देवों को प्रसन्न करने के लिए पितृपक्ष में श्राद्ध करना अति आवश्यक हो जाता है। इसके अलावा भी हमें कई तरह की सावधानियां बरतनी चाहिए। जिससे कि पितृदेव नाराज ना हो। आज हम आपको कुछ ऐसी कार्यों के बारे में बताएंगे जिन्हें हमे श्राद्ध के दौरान भूलकर भी नहीं करना चाहिए। नहीं तो, हमारे पित्तृगण हमसे नाराज हो सकते हैं।

पितृपक्ष में बाल न कटवाएं

श्राद्ध के दौरान नाखून, बाल या दाढ़ी मूंछ नहीं कटवाने चाहिए। कहते हैं कि ये समय पितरों को याद करने का होता है और ऐसा करना शोक व्यक्त करने के बराबर होता है। इसके अलावा खासतौर पर श्राद्ध में तर्पण करने वाले व्यक्ति को पूर्वजों का श्राद्ध तर्पण करने वाली तिथि से पहले अपनी दाढ़ी, मूंछ और बाल नहीं कटवाने चाहिए। ऐसा करने पर पूर्वज नाराज हो सकते हैं।

कोई नया सामान ना खरीदें

शास्त्रों के अनुसार रात के 15 दिनों के दौरान हमें कोई भी नई वस्तु नहीं खरीदनी चाहिए। ऐसा करने से पितृदेव नाराज हो सकते हैं। श्राद्ध के दौरान हमें पितृदेव को प्रसन्न करना होता है नाराज नहीं।

अतिथि या भिखारी का अपमान ना करें

श्राद्ध के दौरान किसी भी भिखारी को दान दक्षिणा देने से मना ना करें। ऐसा करने से पितृदेवों का अपमान होता है। कहते हैं कि इन दिनों किया गया दान पुण्य पितरों की आत्मा को तृप्त करता है। इसके अलावा घर में आए किसी भी अतिथि या निर्धन व्यक्ति को भोजन या दान दिए बिना विदा नहीं करना चाहिए। हिंदू शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध के दिनों में हमारे पितृदेव किसी भी रूप में हमारे घर आ सकते हैं, इसीलिए इस दौरान घर पर आए किसी भी व्यक्ति अनादर नहीं करना चाहिए। नहीं तो पितृदेव रुष्ट हो सकते हैं।

तामसिक भोजन न करें

जो लोग श्राद्ध के दौरान पितरों का पूजन और पिंड दान करते हैं, उन्हें तामसिक भोजन जैसे मांस और मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। बल्कि सात्विक भोजन करना चाहिए। जिनके माता-पिता जीवित होते हैं। उनके लिए कोई विशेष नियम नहीं है, लेकिन श्राद्ध के दौरान सात्विक भोजन करना ही उत्तम होता है।

किसी भी जीव जंतु करो ना करे परेशान

पुराणों की मानें तो मृत्यु के बाद किसे कौन सी योनि मिलेगी, यह कोई नहीं जानता। हमारे पितृदेव मनुष्य है या पशु-पक्षी यह कह पाना भी कठिन होता है। इसीलिए श्राद्ध के दौरान सभी जीवों में पितरों का वास मानकर उनको परेशान नहीं करना चाहिए। हो सके तो जानवरों या पशु पक्षी के लिए पानी, खाने या दानें का इंतजाम करना चाहिए।

लोहे के बर्तन का न करें उपयोग

पितृपक्ष के दौरान लोहे के बर्तन का उपयोग करने से बचना चाहिए, नहीं तो पितृदेव नाराज हो जाते हैं। पितरों को तांबे या पीतल के बर्तनों में ही जल देना चाहिए। हो सके तो ब्राह्मणों को भी पत्तल में भोजन कराएं और स्वयं भी पत्तल में ही भोजन करें। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध में पितृ पूजन के दिन इस तरह का भोजन करना शुभ माना जाता है।

सुबह-शाम ना कराएं ब्राह्मणों को भोजन

श्राद्ध के दौरान पितरों की आत्मा की शांति और मुक्ति के लिए ब्राह्मणों को दोपहर में भोजन कराना लाभदायक होता है। शास्त्रों के अनुसार सुबह और शाम का समय देवताओं की पूजा का होता है, जबकि श्राद्ध के दौरान आधे प्रहर का समय पितरों का होता है।

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