सावन शिवरात्रि 2020 : क्यों है शिवभक्तों के लिए ख़ास?

सावन महिना बहुत ही पवित्र माना जाता है। जो महादेव को अतिप्रिय है। इस दौरान शिव आराधना से शिवभक्तों के समस्त कष्टों का नाश होता है। अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मास में भक्त शिवलिंग पर जल, बिल्वपत्र, भांग, धतूरा, सुगंधित फूल, ऋतुफल, मेवे, मिष्ठान्न समर्पित करते हैं। इस मास में कई प्रमुख तिथि और त्यौहार भी आते हैं। इन्ही में से एक है – सावन शिवरात्रि ।

कब है सावन शिवरात्रि?

वैसे तो शिवरात्रि साल मे 12 या 13 बार आने वाला मासिक त्यौहार है। ये पूर्णिमा से एक दिन पहिले त्रियोदशी के दिन आता है। शिवरात्रियों में से दो सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। फाल्गुन त्रियोदशी महा-शिवरात्रि के नाम से प्रसिद्ध है और दूसरी सावन शिवरात्रि के नाम से जानी जाती है। यह त्यौहार भगवान शिव-पार्वती को समर्पित है। इस दिन भक्त भगवान शिव के प्रतीक शिवलिंग पर बेलपत्र और जल चढ़ाते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं कि सावन शिव का प्रिय मास है। इस मास की शिवरात्रि के दिन भक्तों की मनोकामनाएं जरूर पूर्ण होती हैं।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस साल सावन शिवरात्रि रविवार यानी 19 जुलाई 2020 को पड़ रही है। आज हम आपको महाशिवरात्रि और सावन शिवरात्रि के महत्व और उससे जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में बताएंगे।

सावन शिवरात्रि का महत्त्व

ये शिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण होती है। सावन शिवरात्रि हर साल सावन महीने में मनाई जाती है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार सावन जुलाई और अगस्त के महीने में आता है। माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ अपने भक्तों की मुराद बहुत जल्दी सुन लेते है। इसीलिए अन्य देवी-देवताओं की तुलना में महादेव के अधिक भक्त होते हैं। भगवान भोलेनाथ का दिन सोमवार का माना जाता है और उनकी पूजा का श्रेष्ठ महीना सावन है। महाशिवरात्रि और सावन सोमवार दोनों शिवभक्तों के लिए बहुत ही शुभ माने जाते हैं।

Lord Shiva

सावन शिवरात्रि को कांवड़ यात्रा का समापन दिवस भी कहा जाता है। ये जुलाई या अगस्त के महीने मे आती है। महादेव के भक्त हिंदू तीर्थ स्थानों हरिद्वार, गौमुख या गंगोत्री, सुल्तानगंज में गंगा नदी, काशी विश्वनाथ, बैद्यनाथ, नीलकंठ और देवघर सहित अन्य स्थानो से गंगाजल भरकर अपने-अपने स्थानीय शिव मंदिरों में इस पवित्र जल को चढ़ाते हैं। सावन में भगवान शिव का सबसे पवित्र दिन शिवरात्रि होता है। जो सकारात्मक उर्जा का श्रोत है, इसलिए जल चढ़ाने के लिए पूरा दिन ही पवित्र और शुभ माना गया है।

जैसा कि सभी जानते हैं कि हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मासिक शिवरात्रि आती है, लेकिन सावन महीने की आने वाली शिवरात्रि को फागुन महीने में आने वाली शिवरात्रि के समान ही फलदाई और शुभकारी माना जाता है। इन दोनों शुभ दिनों का अपना-अपना महत्व है। दोनों के बारे में पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं तो चलिए जानते हैं कि ये पैराणिक कथाएं क्या कहती हैं।

फाल्गुन शिवरात्रि की कथा

सबसे पहले बात करते हैं फाल्गुन की महाशिवरात्रि की कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव की पार्वती देवी से शादी हुई थी। इसलिए महादेव के भक्तगण महा शिवरात्रि के दिन को गौरी-शंकर की शादी की सालगिरह के रूप में मानते हैं। इस दिन व्रत में भोलेनाथ के भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं। इस दिन भक्त शिवलिंग को दूध, दही, शहद, गुलाब जल, आदि के साथ हर तीन घंटे के अंतराल में सारी रात पूजा करते हैं। महाशिवरात्रि के दिन दो महान प्राकृतिक शक्तियों, रजस एवं तमस के एक साथ आने का दिन है। शिवरात्रि व्रत इन दोनों शक्तियों का सही नियंत्रण है।

इस व्रत से आप वासना, क्रोध, और ईर्ष्या जैसे बुराइयों को नियंत्रण कर सकते हैं। हर तीन घंटे शिवलिंग की पूजा के एक दौर आयोजित किया जाता है। पुराणों के अनुसार, इस रात को ग्रहों की स्थिति कुछ ऐसी होती है कि मानव तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर होता है। अतः योगी साधक भक्त शरीर को सीधी स्थिति में रखते हैं और सारी रात सोते नहीं हैं। वे महादेव का ध्यान कर उनसे मनचाहा वरदान पाते हैं।

इसके अलावा एक कथा के अनुसार एक बार पृथ्वी की रचना पूरी होने के बाद, पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा कि भक्तों के कौन से अनुष्ठानों से आपको सबसे ज़्यादा प्रसन्नता होती है। भगवान ने कहा है कि फाल्गुन के महीने के दौरान शुक्लपक्ष की 14वीं रात मेरा पसंदीदा दिन है। इसीलिए भी महाशिव रात्रि को दिन शिवभक्तों को अति प्रिय है।

सावन शिवरात्रि की कथा 

अब बात करते हैं सावन शिवरात्रि की। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तब समुद्र से विष का एक घड़ा निकला था। लेकिन इस विष के घड़े को न ही देवता और न ही असुर लेने को तैयार थे। तब विष के प्रभाव को खत्म करने के लिए और समस्त लोकों की रक्षा के लिए भगवान भोलेनाथ ने इस विष का पान किया था। विष के प्रभाव से भगवान शिव के शरीर का तापमान बढ़ता ही जा रहा था। तब सभी देवताओं ने विष के प्रभाव को कम करने के लिए महादेव पर जल चढ़ाना शुरू किया था। जिससे उनके शरीर का तापमान सामान्य हो जाए।

कहते हैं उस समय सावन का महीना चल रहा था और तभी से सावन के महीने में भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा चली आ रही है। आपको बता दें कि सावन में आने वाली शिवरात्रि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि इसमें भगवान शिव का जलाभिषेक करना बहुत ही पुण्य कार्य माना जाता है। पूरे महीने शिवभक्त बम-भोले हर-हर महादेव के नारे लगाते कांवड लेकर आते –जाते हुए नजर आते हैं।

ये करने से मनोकामनाएँ होंगी पूर्ण 

शिवरात्रि के दिन जलाभिषेक के लिए हरिद्वार या गौमुख से जल लेकर आते हैं। मान्यता है कि सावन शिवरात्रि के दिन जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान शिव की पूजा करते हैं और शिवलिंग पर गंगा जल चढ़ाते हैं, महादेव उनके कष्टों का निवारण करते हैं। इतना ही नहीं प्रसन्न होकर महादेव अपने भक्तों को मनवांछित वरदान भी देते हैं। अगर आप भी भोलेनाथ से मनचाहा आशीर्वाद या वरदान चाहते हैं तो आप 19 जुलाई 2020 शिवरात्रि के दिन भोलेनाथ के शिवलिंग पर गंगा जल या शुद्ध जल अवश्य चढ़ाएं और साथ ही ओम नम शिवाय मंत्र का 108 बार जप जरूर करें। फिर देखिए भोलेनाथ आपकी इच्छा कैसे चुटकियों में पूरा करते हैं।

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