परिवर्तिनी एकादशी : जानिए व्रत कथा, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

परिवर्तनी एकादशी

हिंदू धर्म में एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने का विधान है। वैसे तो हर महीने 2 एकादशी के व्रत आते हैं। हर महीने में आने वाली इन एकादशियों का खास महत्व होता है। शास्त्रों के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु 4 महीने के लिए सो जाते हैं और फिर देवउठनी एकादशी के दिन ही अपनी निद्रा से जागते हैं, लेकिन इन महीनों में एक ऐसा समय भी होता है। जब भगवान विष्णु सोते हुए अपनी करवट बदलते हैं। उस दिन को परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी भादो मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन होती है। जिसे पार्श्व एकादशी, जलझूलनी एकादशी, वामन एकादशी और जयंती एकादशी जैसे कई नामों से भी जाना जाता है। इस साल परिवर्तिनी एकादशी 29 अगस्त 2020 को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है। सनातन धर्म में एकादशी का बहुत ही खास महत्व होता है। इस दिन व्रत करने और पूजा पाठ करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है। जो भी इस व्रत को सच्चे मन और श्रद्धा भाव से रखता है, उसे सभी पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आज हम आपको 29 अगस्त को होने वाली परिवर्तिनी एकादशी व्रत की कथा, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में बताएंगे।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

मान्यता है कि परि परिवर्तिनी एकादशी के दिन व्रत रखने और इसकी कथा पढ़ने या सुनने से हजारों अश्वमेध यज्ञ के जितना ही फल मिलता है। पौराणिक कथा के अनुसार त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर था। लेकिन असुर होने के बावजूद भी वह बहुत ही दयावान और सत्यवादी था। इसके अलावा वो बाकी असुरों की तरह ब्राह्मणों का अपमान या उनकी हत्या नहीं करता था, बल्कि उनकी सेवा करता था। बलि हमेशा ही तप और यज्ञ किया करता था, जिनके प्रभाव से उसने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। जिस कारण देवराज इंद्र सहित कई देवता गण उसके इस प्रभाव से भयभीत हो गए और भगवान विष्णु के पास गए।

उन्होंने भगवान विष्णु से कहा कि राजा बलि से हम सबकी रक्षा कीजिए। जिसके बाद भगवान विष्णु ने धरती पर वामन रूप में अवतार लिया और राजा बलि की परीक्षा लेने के लिए उसके पास पहुंचे। राजा बलि की एक खास बात यह भी थी कि वह अपने द्वार पर आए, किसी भी ब्राह्मण को कभी भी खाली हाथ नहीं भेजता था। वह उसकी मांगे और जरूरत को अवश्य पूर्ण करता था। जब वामन रूपी विष्णु राजा बलि के पास पहुंचे, तो उन्होंने उससे तीन पग जमीन मांगी। जिस पर दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को भगवान विष्णु की इस चाल के बारे में भी बताया। लेकिन राजा बलि ने कहा यह छोटा सा बालक तीन पग जमीन ही तो दान में मांग रहा है। इतने में मेरा कोई नुकसान नहीं होगा, इसीलिए राजा बलि ने वामन को तीन पग जमीन देने का वचन दे दिया।

इसके बाद भगवान विष्णु के वामन अवतार ने विशालकाय रूप धारण किया। फिर 2 पगों में समस्त लोकों को नाप लिया और वह लोक अब वामन के हो चुके थे। लेकिन अब तीसरे पद के लिए राजा बलि के पास कुछ ना बचा, तो अपना वचन पूरा करने के लिए उन्होंने वामन के आगे अपना शीश झुका लिया। वामन को तीसरा पग शीश पर रखने को कहा। राजा बलि की ऐसी भाव इच्छा देखकर भगवान विष्णु अपने असली रूप में आए और राजा बलि को धरती लोग छोड़ कर पाताल लोक में रहने को कहा। राजा बलि ने ऐसा ही किया। इस तरह भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीनो लोकों को छुड़वा कर, उन्हें देवताओं को वापस कर दिया।

शुभ मुहूर्त

परिवर्तिनी एकादशी का प्रारंभ 28 अप्रैल 2020 को सुबह 8:48 से शुरू होगा।

परिवर्तिनी एकादशी की समाप्ति 29 अगस्त 2020 को सुबह 8:17 पर होगी।

व्रत के पारण का समय 30 अगस्त 2020 की सुबह 5:58 से 8:21 बजे तक रहेगा।

पूजा विधि

  1. परिवर्तिनी एकादशी का व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर घर की साफ सफाई करने के बाद स्नान करना चाहिए और साफ वस्त्र पहनने चाहिए।
  2. घर के मंदिर में या पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की कोई फोटो या प्रतिमा स्थापित करने के बाद उस पर गंगाजल का छिड़काव करें।
  3. इसके बाद भगवान विष्णु की उस प्रतिमा या फोटो को फल फूल नारियल और मेरे चढ़ाएं।
  4. इसके बाद एक दीपक जलाकर,धूपदिखाएं और फिर भगवान विष्णु जी की आरती उतारें।
  5. परिवर्तिनी एकादशी की कथा पढें या सुनें।
  6. फिर भगवान विष्णु का ध्यान कर उनके सम्मुख अपनी इच्छा रखें।जिससे वह आपकी मनोकामना पूर्ण कर सकें।
  7. भगवान विष्णु को भोग लगाएं। ध्यान रहे, उनके भोग में तुलसी के पत्ते का अवश्य प्रयोग करें।
  8. परिवर्तिनी एकादशी का दिन बहुत ही शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। इसीलिए इस दिन रात को सोना नहीं चाहिए और भगवान विष्णु की पूजा अर्चना या भजन कीर्तन करने चाहिए।
  9. फिर अगले दिन सुबह पारण के समय किसी ब्राह्मण या निर्धन व्यक्ति को भोजन कराएं और अपनी श्रद्धा अनुसार कुछ तारण दक्षिणा देनी चाहिए।
  10. इन सब के बाद ही अन्न और जल ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए।

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