सावन का पहला प्रदोष व्रत, इन 3 मंत्रों से प्रसन्न होंगे महादेव

हिन्दू धर्म में एकादशी के व्रत को भगवान विष्णु से तो प्रदोष व्रत को भोलेनाथ से जोड़ा जाता है। इस बार सावन का पहला प्रदोष व्रत 18 जुलाई 2020 को है। जिसे हिंदू धर्म के अहम व्रतों में से एक माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा-आराधना की जाती है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सावन में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार

हिंदू चंद्र कैलेंडर के मुताबिक प्रदोष व्रत चंद्र मास के 13वें दिन यानी त्रयोदशी को होता है। यदि कोई भी व्यक्ति प्रदोष व्रत श्रद्धापूर्वक और विधि-विधान के साथ करता है, तो उसे मोक्ष प्राप्ती होती है। साथ ही व्यक्ति के सारे पाप भी धुल जाते हैं।

प्रदोष व्रत की महिमा

शास्त्रों के अनुसार प्रदोष रखने से मनुष्य की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। प्रदोष को लेकर एक पौराणिक तथ्यों की माने तो ‘एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगा। व्यक्ति सत्कर्म करने की बजाय नीच कामों को ज्यादा करेगा।
उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रखेगा और शिव आराधना करेगा, उस पर महादेव की विशेष कृपा होगी। इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म- जन्मान्तर के अपने कर्मों से मुक्त होकर मोक्ष के मार्ग पर जाएगा।

प्रदोष को प्रदोष कहने की कथा

इसके नाम के पीछे भी एक कथा है। जिसके अनुसार एक बार चंद्र को क्षय रोग हो गया था। जिसके चलते उन्हें मृत्यु से भी कठिन कष्टों झेलना पड़ रहा था। भगवान भोलेनाथ ने चंद्र के उस दोष का निवारण करने के लिए उन्हें त्रयोदशी के दिन पुन: जीवन प्रदान किया। इसीलिए इस दिन को प्रदोष कहा जाने लगा। जिस तरह हर महीने दो एकदशी होती है, उसी तरह दो प्रदोष भी होते हैं। त्रयोदशी को ही प्रदोष कहा जाता है।

प्रदोष व्रत की 10 खास बातें

1. प्रदोष व्रत रखने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।
2. नित्यकर्मों को जल्दी कर, भगवान भोलेनाथ का स्मरण करना चाहिए।
3. इस व्रत में आहार नहीं लिया जाता है।
4. पूरे दिन उपावस रखने के बाद सूर्यास्त से एक घंटा पहले, स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करने चाहिए।
5. पूजन स्थल को गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध करने के बाद, गाय के गोबर से लीपकर, मंडप तैयार करना चाहिए।
6. फिर इस मंडप में पांच रंगों का उपयोग करते हुए रंगोली बनानी चाहिए।
7. प्रदोष व्रत कि पूजा करने के लिए कुशा के आसन का ही प्रयोग करना चाहिए।
8. पूजा की तैयारियां करने के बाद उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठकर भगवान भोलेनाथ का पूजन करना चाहिए।
9. पूजा में महादेव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिवलिंग पर जल चढ़ाना चाहिए.
10. अंत में प्रदोष व्रत का उद्यापन त्रयोदश तिथि को ही करना चाहिए।

तीन महामंत्रों का जाप

अब आपको उन 3 मंत्रों के बारे मे बताते हैं जिनसे महादेव जल्दी प्रसन्न हो जाएंगे और आपको मनचाहा वरदान देंगें।

रूद्र गायत्री मंत्र

ॐ तत्पुरुषाय विदमहे, महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात्।।
यह शिव गायत्री मंत्र है, जिसका जप करने से मनुष्य का कल्याण संभव है। सावन में शिव गायत्री मंत्र का जप विशेष फल प्राप्त होता है। रूद्र गायत्री मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।

महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शिवपुराण के अनुसार ये मंत्र जीवन देने वाला है। इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए।

 शिव जी का मूल मंत्र

ऊँ नम: शिवाय।।
इस मंत्र का भी 108 बार जाप करने से महादेव प्रसन्न होकर, सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर देते हैं।

प्रदोष व्रत का महत्व

शिव भक्त हर महीने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति 11 या एक वर्ष के सारे त्रयोदशी के व्रत करता है तो उसकी सारी मनोकामनाएं अवश्य और जल्दी पूरी होती है। प्रदोष के व्रत रखने से व्यक्ति का चंद्र ठीक होता है।
कहते हैं कि चंद्र के सुधार से शुक्र भी सुधरता है और शुक्र के सुधरने से बुध भी अपने आप सुधर जाता है। अलग-अलग दिन पड़ने वाले प्रदोष का महत्व भी अलग-अलग ही होता है। जिनके बारे में हम आपको बताते हैं।

दिवस का महत्त्व

रविवार 

रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष को भानुप्रदोष या रवि प्रदोष कहा जाता है। इस दिन प्रदोष रखने से जीवन में सुख, शांति और लंबी आयु की प्राप्ती होती है। रवि प्रदोष का संबंध सूर्य से होता है, इसीलिए इस दिन का व्रत रखने से चंद्रमा के साथ सूर्य भी आपके जीवन में सक्रिय रहता है।
सूर्य से संबंधित होने के कारण ये जीवन में आपको नाम, यश और सम्मान भी दिलाता है। अगर आपकी कुंडली में अपयश के योग हो तो इस प्रदोष का व्रत आपको अवश्य करना चाहिए। रवि प्रदोष रखने से सूर्य संबंधी सारे दुख दूर हो जाते हैं।

सोमवार 

त्रयोदशी तिथि सोमवार को पड़ने पर इसे सोम प्रदोष कहते हैं। इस व्रत से इच्छा अनुसार फल प्राप्ति होती है। जिसका चंद्र खराब होता है उनको तो यह प्रदोष जरूर नियम ‍पूर्वक रखना चाहिए । जिससे उनके जीवन में शांति बनी रहेगी। कई लोग संतान की प्राप्ति के लिए भी सोम प्रदोष का व्रत रखते हैं।

मंगलवार 

मंगलवार को आने वाले इस प्रदोष को भौम प्रदोष कहा जाता है। इस दिन प्रदोष व्रत विधिपूर्वक रखने से कर्ज से जल्दी मुक्ती मिल जाती है। भौम प्रदोष का व्रत रखने से स्वास्थ्य सबंधी समस्याओं से मुक्ति पाई जा सकती है।

बुधवार 

बुधवार को आने वाले प्रदोष को सौम्यवारा प्रदोष कहा जाता है, जो शिक्षा और ज्ञान की प्राप्ति के लिए किया जाता है।अगर आप को ईष्‍ट प्राप्ति की इच्‍छा है तो यह प्रदोष जरूर रखें। इसके साथ ही यह सभी मनोकामनाओं को भी पूर्ण करता है।

गुरुवार 

गुरुवार को आने वाले प्रदोष को गुरुवारा प्रदोष कहते हैं। अक्सर यह प्रदोष शत्रु और सभी खतरों से छुटकारा पाने के लिए किया जाता है। इससे आपका बृहस्पति ग्रह शुभ प्रभाव देता है । इसके अलावा इस दिन का व्रत करने से पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है।

शुक्रवार 

इसे भ्रुगुवारा प्रदोष कहते हैं। जीवन में सौभाग्य की वृद्धि के लिए इस प्रदोष का व्रत रखा जाता है। इतना ही नहीं इससे जीवन में हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

शनिवार 

शनिवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। इस दिन व्रत रखने से पुत्र की प्राप्ति होती है। हालांकि कुछ लोग हर तरह की मनोकामना और नौकरी में पदोन्नति की प्राप्ति के लिए इस प्रदोष का व्रत रखते हैं।

 

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