पितृपक्ष के बाद शुरू नहीं होंगे नवरात्र, 165 साल बाद बना ये संयोग

नवरात्रि

सनातन धर्म में नवरात्रि के 9 दिनों का बहुत ही खास महत्व होता है हर बार श्राद्ध खत्म होने के अगले दिन से ही नवरात्रि का पर्व शुरू हो जाता है और इसके साथ ही कलश की स्थापना की जाती है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो पाएगा। दरअसल इस साल श्राद्ध खत्म होने के अगले दिन से ही अधिकमास लग जाएगा । जिसके कारण नवरात्रि का यह पावन पर्व 20 से 25 दिनों के लिए आगे चले जाएगा। इस साल 2 महीनों का अधिकमास लगने जा रहा है। अधिकमास को कई जगहों पर पुरुषोत्तम और मलमास के नाम से भी जाना जाता है।

आज हम आपको अधिक मास के बारे में बताएंगे इसके साथ यह भी बताएंगे कि 165 साल बाद ऐसा कौन सा अद्भुत संयोग बन रहा है। जिससे सभी के जीवन में बदलाव आने वाले हैं।

अधिक मास क्या होता है

जहां एक सूर्य वर्ष में 365 दिन और लगभग 6 घंटे होते हैं वही एक चंद्र वर्ष में 354 दिन होते हैं। दोनों ही वर्षों के बीच में कम से कम 11 दिनों का अंतर होता है, लेकिन यह 11 दिनों का अंतर हर 3 साल में लगभग 1 महीने के बराबर हो जाता है और इसी अंतर को दूर करने के लिए हर 3 साल में एक चंद्र मास ज्यादा होता है । जिसे अतिरिक्त होने की वजह से अधिकमास कहा जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि चंद्रमा और सूर्य के बीच का संतुलन बना रहे इसी लिए अधिक मास होता है। तभी इस साल 4 महीने का चतुर्मास इस साल चतुर्मास 5 महीने का होगा।

अश्विनी मास का अधिकमास होने के कारण अश्विनी मास 2 मास का होगा। अश्विनी मास में श्राद्ध नवरात्रि और दशहरे जैसे त्यौहार मनाए जाते हैं, लेकिन अधिक मास लगने के कारण इस बार दशहरा 26 अक्टूबर 2020 को और दिवाली भी 14 नवंबर 2020 को होगी।

अधिकमास को मलमास या पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है

अधिकमास को कुछ जगहों पर मलमास भी कहा जाता है। इस पूरे महीने में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। कहते हैं कि इस पूरे महीने सूर्य संक्रति नहीं होने के कारण यह महीना मलीन माना जाता है। जिस कारण लोग इसे मलमास भी कहते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार मलमास के दौरान मुंडन, ग्रह प्रवेश, विवाह या कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है। इसके साथ ही अधिकमास को पुरुषोत्तम कहे जाने के पीछे एक पौराणिक मान्यता है। इस मान्यता के अनुसार मलमास होने की वजह से कोई भी देवी-देवता इस महीने में अपनी पूजा नहीं करवाना चाहते थे।

देवता नहीं बनना चाहते थे। तब मलमास में जाकर स्वयं श्री हरि विष्णु से उसे स्वीकार करने का आग्रह किया। कहते हैं कि तब श्री हरि ने इस महीने को अपना नाम दिया पुरुषोत्तम। तभी से इस महीने को पुरुषोत्तम मास की कहा जाता है। इस महीने भागवत कथा सुनने या प्रवचन सुनने का खास महत्व होता है। इसके साथ ही अधिक मास में भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस महीने किए जाने वाले दान पुण्य का भी बहुत लाभ मिलता है।

165 साल बाद बना रहा है संयोग

ज्योतिष शास्त्र की माने तो 165 साल बाद अधिक मास और लीप ईयर एक ही साथ 1 साल में पड़ रहे हैं। चतुर्मास लगने के कारण इस महीने कर्ण छेदन, मुंडन, विवाह जैसे कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जा सकते । यह महीना केवल पूजा –पाठ, व्रत, उपवास और साधना करने का होता है । हिंदू शास्त्रों के अनुसार इस महीने में सभी देव सो जाते हैं और देवउठनी एकादशी के बाद ही जागते हैं।

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